मैदान में आने से पहले ही
जीतना था जिनको
वे असल खिलाडी तो जीत चुके
बची ही नहीं अब बाज़ी
जितना मर्ज़ी
कूदो फादों, दौड़ो भागो
लो गुलटियाँ
वे मंद मंद मुस्कुराते रहेंगे
बिना किसी शिकन , शर्म के
छाती चौड़ी किए
इसमें हैरान होने जैसा नहीं कुछ
जो लोकतंत्र को खेल
बैठे हैं जीत कर
उन्हें तो खेल में खेल कर
खेल से पहले
जीतना ही था ...
रघुवीर सहाय ने कभी कहा था- ' दल का दल/ पाप छिपा रकने के लिए/ एकजुट होना/ जितना ही बड़ा दल होगा / उतना ही खायेगा देश को' अब तो क्या छोटा क्या बड़ा सब खाने पर लगे हैं. सिर्फ दोष राजनीतिज्ञों को ही क्यों? क्या मीडिया में ऐसे लोग नहीं घुस पड़े हैं?
ReplyDeleteNot for the first time in India .... but may be one the biggest single plunder !
ReplyDeletevery well said!!
--
Pranjal