Thursday, August 26, 2010

खेल पर हुए खेल में 
मैदान में आने से पहले ही 
जीतना था जिनको 
वे असल खिलाडी तो जीत चुके 
बची ही नहीं अब बाज़ी 
जितना मर्ज़ी 
कूदो फादों, दौड़ो भागो 
लो गुलटियाँ
वे मंद मंद मुस्कुराते रहेंगे 
बिना किसी शिकन , शर्म के 
छाती चौड़ी किए
इसमें हैरान होने जैसा नहीं कुछ  
जो लोकतंत्र को खेल 
बैठे हैं जीत कर 
उन्हें तो खेल में खेल कर 
खेल से पहले 
जीतना ही था ...