Friday, September 3, 2010

एक रहय भावुक देश/
ओकर  गोर महरानी/
सपन के नाइ राजकुंवर/
हुंकारी भरत सैकडन बजीर आ दरबारी/
उजरी उजरी अट्टालिका के जूड जूड अटारी माँ बैठ /
चालवत हें भावुक देश के राजकाज/
का रानी ,का बजीर ,का दरबारी सब बोलायं एक बोल/
कहयं उनके राज माँ सगरे गरीब होत जात हें धन्नासेठ/
पर अट्टालिका के बहार न देखयं कोऊ/
जन्हा रहय हियाँ से हुआं तक दाना पानी बिना बिलबिलात मनइन के कतारय कतार/
झूल फंदा माँ रोज जात रहय सरग किसान/
भावुक देश का जग जानय खेती खरिहानी केर देश/
एही से दरबार माँ रहो बना सबन्ने के साथ खेती किसानी के बजीर/
लम्ब दंड गोल पिंड के शौक़ीन  मोट गाँठ वाला कपार तक अघान बजीर/
नहीं जानत रहा जौन माटी, बीज आ किसान के सम्बन्ध/
नहीं देखे रहा कबो धंसे पेट , निहुरी पीठ और झुरान पसुली /
बजीर के लेत राजकाज पहलें से मरत मनईंन का दूभर होयगा दाना/
दाना के दाम छुयय लाग सरग/
अबे तक मरत रहें दाना बोवय उपजावय वाले/
लागे मरय रोज मजूरी कर खरीद  खाय वाले/

एक दिना  कुछु ओटु फोटू डब्बा वाले देखिन बहुत एक्का दाना सड़त अटरियन मा/
मूस मारे रहयं मौज/
होइगें मोटाय के मलंग/
घुन के फ़ौज रही उधान/
या टोला से व टोला मा पेट सिकोड़े हाँथ पसारे मची रहय गोहार दाना दाना/
पहुंची लग्गा दूती भावुक देश के न्याय मंदिर/
कहिन पुजारी बाँट देय बजीर भूखन मा सगळा दाना/
बात पहुंची दरबार/
निहारे लागें बजीर मुह घुमाय रानी कैती/
ऊँ ना बोली कुछु/ तबो बजीर जान गें सब कुछु/
मारिन बहाना/
कहाँ कहिस, केसे कहिस/
नहीं आय न्याय मंदिर के कौनो कागज/
फेर कुछु दरबारी जताईन अफ़सोस/
फेर र्रानी ,कुंवर, बजीर, दरबारी/
सब चलेंगे जूड जूड मोटर मा बैठ/
दाना के रस पीन/खाइन पकवान/
लिहिन डकार/
आ गें सोय/
मनइ मरत रहा भावुक देश मा भूख से.