बातें
आप कभी अपने आप से
करते हैं बातें ....
आप कहेंगे सनकी हूँ
जो खुद से बातें करुँ
आप कहेंगे सनकी हूँ
जो खुद से बातें करुँ
...पर वो करती है
बातें अपने आप से
खुद से ही सवाल करती
जवाब तलाशती
बातें अपने आप से
खुद से ही सवाल करती
जवाब तलाशती
कई बार हंसती
जाने क्या बोलती हुई
कभी सहसा कुछ फैलता जाता
कोरों से बह निकले को आतुर
वो समेटती उसे
छुपाती पलकों के भीतर
फिर कुछ बुदबुदाती
जैसे हिदायद दे रही हो
समझा रही हो खुद को
छुपाती पलकों के भीतर
फिर कुछ बुदबुदाती
जैसे हिदायद दे रही हो
समझा रही हो खुद को
कितनी सारी बातें
हंसी की ख़ुशी की
उदासी की समझाइस की
निराशा की हौसले की
वो करती रहती अपने आपसे
पर हज़ार कोशिशों के बाद भी
कई बार उसकी बातें
उतर ही आती उसकी आँखों में
झलकने लगती चेहरे पर
ऐसे ..जैसे
बरस जाना चाहती हों
बूँद बनकर
घुल जाने के लिए
मिटटी में
जैसे उड़ जाना चाहती हों
सोंधी खुशबू बनकर
बादल में
एक बार फिर
बूँद बनकर बरस जाने को
वो सारी बातें
जो करती है वो अपने आप से
................
सोंधी खुशबू बनकर
बादल में
एक बार फिर
बूँद बनकर बरस जाने को
वो सारी बातें
जो करती है वो अपने आप से
................
( अपनी एक दोस्त पर )
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